Illiterate Education System

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टपक रहा है खुन किताबो से,
कलम गुजर रही थी कब्रस्तानो से।
छुप बैठे है कातिल दिवारो में,
हम ढुंढ रहे थे उसे बागिचो में।
लगता था रोशनी आयेगी चरागो से,
वोह खेल रहे थे मशालो से।
सपने बुने थे कइ गाउ में उसके,
दहकी थी गलिया शहेरो में उसके।
गांधी-सुभाष को दुर छोड चले,
अफजल - भट की राह चल पडे।
आशा है की “पथीक” बन चले,
राष्ट्रप्रेम का प्रतिक बन चले॥


जो हुवा वोह गलत हुवा, जो हो रहा है वोह गलत है लेकिन आशा है के भविष्य अंधेरेमें डुबा हुवा नही होगा| युवा पेढी जिस रास्ते को अपनाके आगे बढ रही है उसमे उसकी इतनी गलती नहीं है जितनी गुरुजनो की है। गर कोइ पौधे को सही खाद-पानी नही मिलता है तो गलती पौधे की नहीं उस माली की है। JNU में जो हुवा वोह एक तरह से शैक्षणिक प्रणालि की हि नाकामी हैं (छुप बैठे है कातिल दिवारो में, हम ढुंढ रहे थे उसे बागिचो में)। मांजरा पेचिदा है और इस घटना को कोइ एक परिपेक्ष्य में देखना भी मुनासिब नही होगा। डर इस बात का है की हमारी आज की गलती आने वाली पेढी को भुगतनी पडेगी।


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