हम विरोध क्यों करते है?

हाँ, हमें सिर्फ विरोध करना ही आता है। आज तक हमने विरोध करने के अलावा किया ही क्या है?  जन्म से लेकर मृत्यु तक, बचपन से ले कर बुढ़ापे तक, विरोध विरोध और सिर्फ विरोध। पूछो अपने आप से की हमने चीज़ों का, व्यक्तियों का, विचारों का स्वीकार ज्यादा किया है या विरोध? बचपन में स्कूल जाने का, जवानी में समाज का और बुढ़ापे में मृत्यु का। हम विरोध के सहारे तो जी रहे है। हमें सिर्फ विरोध करना सिखाया जाता है क्यों की विरोध से ही तो हमारा अस्तित्व बना रहता है। अगर स्वीकार किया तो गए काम से, अपने आप को खो देंगे। हमें सालों से, हजारों सालों से यह सिखाया जाता है की अगर दुनिया में अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो दूसरों का अस्वीकार करके उनसे बेहतर करो, उनको तोड़ डालो। विरोध करने की कला बहुत पुरानी है क्यों की उसी पर तो सारी दुनिया का व्यवहार चलता है। अपनी जाति को दूसरों की जाती से बेहतर बनाना है, अपने धर्म को दूसरों के धर्म से बढ़िया बताना है, अपनी संस्कृति, अपने विचार को शिखर पर पहुँचाना है इसीलिए तो दूसरों का विरोध करके तोड़ देते है, निम्न बना देते है।

क्या विरोध करना उचित है? क्या हमें जो सिखाया जा रहा है वह उचित है? हां, लगता तो है क्योंकि पुरखों द्वारा श्रेष्ठ होना नहीं सर्वश्रेष्ठ होना कहा गया है। क्या सर्वश्रेष्ठ होने की सोच का विरोध किया है, अरे, क्या आपने कभी इस पर सोचा भी है? नहीं, क्यों की हमें बचपन से ही सिखाया गया है कि स्वीकार करना छोडो और विरोध करो। तुम सुबह जल्दी उठना सीखो चाहे अपनी सुखकारी नींद का विरोध करना पड़े। वर्गमें प्रथम आओ, भले ही अपने खेल के मैदान की धूल का विरोध करना पड़े। खूब पैसे कमाओ भले ही अपने शौक का विरोध करना पड़े। अपनी जिंदगी अब ख़त्म होने को है तो मृत्यु का विरोध करो भले ही तुम ईश्वरमें एकाकार होने के आनन्द को खो दो। हमें जो सिखाया गया है, जो लिखा गया है, जो पढ़ाया है, जो कहा गया है उनका विरोध करना हमें नहीं सिखाया गया, क्यों? यह “क्यों” बहोत बड़ा है, इतना बड़ा की इनका विरोध करना हम सोच भी नहीं सकते।

इसी विरोध के विरोधमें लिखा हुवा लेख सब विरोधियो को समर्पित करता हूँ ।

।। अस्तु ।।

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